" अश्वत्थामा मर गया,…………………"…

" अश्वत्थामा मर गया,…………………"
एक बार मैं खरना का प्रसाद खाने एक नेता जी के यहां बैठा था, वहां बहुत से नेता थे जो अक्सर बिहार के टीवी डिबेट में दिखाई देते हैं, किसी बात पर बहस हुई तो मैंने उनसे कहा कि यह तो गलत है अगर अपोजिशन इसके विरोध में तर्क दिया तो क्या कीजिएगा , जवाब आया पहला तो कोई अपोजिशन इतना सुंदर तर्क नहीं देगा , अगर देगा भी तो हम लोग उसको पुरानी बातों में भुला देंगे उलझा देंगे.
सोच रहा हूं, क्या जाने अनजाने मैं हमारे देश में एक systematic तरीके से anti opposition narrative create किया जा रहा है.
सोशल मीडिया का एक वर्ग, बहुत सारे अखबार और टीवी चैनल , मिलकर लगभग सारे अपोजिशन नेताओं को "पप्पु" साबित कर चुके हैं या करने में लगे हुए हैं
क्या इस अंधी " social media" की दौड़ में हम लोग अपने सोचने समझने की शक्ति खोते जा रहे हैं ?
मैं कई बार TV डिबेट देखता हूं तो मुझे लगता है एंकर बहुत ही चालाकी से कुछ बातें दबा जाते हैं , कुछ लोगों के वक्तव्य को छुपा देते हैं , या दबा देते हैं, कुछ खास लोगों को प्रमोट करते हैं अपने डिबेट में बहुत हल्ला करवाते हैं.
क्या बिहार का युवा अपनी तार्किक बुद्धि खोता जा रहा है इस सोशल मीडिया के दौर में, क्यों असल चीजों पर ना जाकर के हमारा युवा भटक जा रहा है बहक जा रहा है
"नर और हाथी के बीच में"




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