डूब मरो…

डूब मरो
अब भी देखते हैं एक पत्रकार जाती की गणित बेच रहा है
चमचा, भक्त सब गा रहा है
प्रवक्ता लोगो को बरगला रहे हैं, बातो का manipulation कर के
सब डूब मरो , अब तुम इंसान नहीं
करेजा नहीं कापता हैं ये सब देख के, रोआयी नहीं आता है
इतना पे भी रात को खाना उतरता है गले से माननीय और अधिकारी सब का




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3 thoughts on “डूब मरो…

  1. मनु और भीम दोनो के किताब में भूख कही लिखा है या बस ….!

  2. माननीय और अधिकारीगण का संवेदना अब दीन-हीन के लिए शेष नही रह गया हैं । स्वार्थ , बेईमानी और भ्रष्टाचार के पापसागर में कब के डूब चुका हैं ।

  3. इंसान और इंसानियत की कोई कदर नहीं सर जी

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